जन्मदिन पर 51 किलोमीटर की पदयात्रा, नई टिहरी से मां कुंजापुरी तक दौड़े अपर जिलाधिकारी शैलेंद्र सिंह नेगी; फिटनेस के साथ दिया पर्यावरण संरक्षण का संदेश।
रिपोर्टर – मनीष सिंह, टिहरी गढ़वाल
पहाड़ के बचपन से प्रशासनिक सेवा तक का सफर किया याद | वीर सैनिकों और शहीदों को नमन, किसानों-मजदूरों से संवाद और 20 से अधिक प्राकृतिक जलस्रोतों का किया अवलोकन
टिहरी गढ़वाल। जन्मदिन को यादगार बनाने के लिए लोग अक्सर उत्सव और समारोह आयोजित करते हैं, लेकिन टिहरी के अपर जिलाधिकारी शैलेंद्र सिंह नेगी ने अपने 51वें जन्मदिन पर एक अनूठा संकल्प लेकर समाज को स्वस्थ जीवनशैली, अनुशासन और पर्यावरण संरक्षण का संदेश दिया। 8 अक्टूबर 2026 को जीवन के 50 वर्ष पूरे कर 51वें वर्ष में प्रवेश करने के अवसर पर उन्होंने नई टिहरी स्थित अपने आवास से मां कुंजापुरी मंदिर तक लगभग 51 किलोमीटर की पदयात्रा की। इस यात्रा ने न केवल फिटनेस के प्रति उनकी प्रतिबद्धता को दर्शाया, बल्कि उन्हें पहाड़ के जनजीवन, इतिहास, संस्कृति, कृषि और प्राकृतिक संपदा को करीब से समझने का अवसर भी दिया।
सुबह करीब 6:30 बजे शुरू हुई इस यात्रा की कोई पूर्व निर्धारित योजना नहीं थी। न अतिरिक्त कपड़े, न भोजन की विशेष व्यवस्था और न ही कोई सहयोगी। मोबाइल फोन और रोजाना मॉर्निंग वॉक में इस्तेमाल होने वाली छड़ी के सहारे निकले अपर जिलाधिकारी ने रास्ते में विभिन्न स्थानों पर रुककर लोगों से संवाद किया, ऐतिहासिक स्मारकों पर श्रद्धांजलि अर्पित की और पहाड़ की जमीनी हकीकत को एक सामान्य यात्री की तरह करीब से देखा।
तीन किलोमीटर की दौड़ से आया 51 किलोमीटर का संकल्प

अपर जिलाधिकारी शैलेंद्र सिंह नेगी सामान्यतः प्रतिदिन छह से सात किलोमीटर दौड़ते हैं। 8 अक्टूबर की सुबह नियमित दौड़ के दौरान करीब तीन किलोमीटर आगे बढ़ने पर उनके मन में विचार आया कि जीवन के 50 वर्ष पूरे होने और 51वें वर्ष में प्रवेश करने के अवसर पर 51 किलोमीटर की यात्रा की जाए।

उन्होंने जिलाधिकारी टिहरी नितिका खण्डेलवाल को फोन पर अपने विचार से अवगत कराया और अनुमति एवं शुभकामनाएं प्राप्त कीं। इसके बाद उन्होंने वापस लौटने के बजाय यात्रा जारी रखने का निर्णय लिया। खास बात यह रही कि उन्होंने अपने इस संकल्प की जानकारी परिवार के सदस्यों सहित किसी अन्य व्यक्ति को भी नहीं दी। यात्रा के दौरान पत्नी और मां के फोन आए, लेकिन उन्होंने अपनी योजना का खुलासा नहीं किया। उन्हें आशंका थी कि परिवार के सदस्य इतनी लंबी दूरी तय करने से रोक सकते हैं।
पहाड़ के बचपन ने तैयार की स्वस्थ जीवनशैली की नींव
जीवन के पांच दशक पूरे होने पर शैलेंद्र सिंह नेगी ने बचपन के संघर्षों और अनुभवों को भी याद किया। पहाड़ के छोटे से गांव में बीता बचपन, शिक्षा के लिए संघर्ष, शिक्षक और शिक्षा समन्वयक के रूप में दुर्गम क्षेत्रों में सेवाएं देने से लेकर प्रांतीय सिविल सेवा में चयन और प्रशासनिक जीवन तक का सफर उनकी जीवन यात्रा का महत्वपूर्ण हिस्सा रहा है।

उनका मानना है कि बचपन में खेतों में काम करना, पशु चराना, जंगलों में घूमना, नदियों में नहाना और पहाड़ी रास्तों पर चलना शरीर को स्वाभाविक रूप से सक्रिय बनाए रखता है। युवावस्था में फुटबॉल, वॉलीबॉल और दौड़ जैसी गतिविधियों ने भी शारीरिक क्षमता विकसित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
उनके अनुसार, जीवन के शुरुआती वर्षों में विकसित सक्रिय जीवनशैली का लाभ आगे भी मिलता है, लेकिन उम्र बढ़ने के साथ स्वास्थ्य के प्रति जिम्मेदारी और बढ़ जाती है। विशेषकर 40 वर्ष की आयु के बाद नियमित शारीरिक गतिविधियों को दिनचर्या का हिस्सा बनाना जरूरी है। हिमालय के दूरस्थ गांवों, बुग्यालों, घाटियों, हिमनदों और नदी क्षेत्रों की यात्राएं भी उनके अनुभवों का हिस्सा रही हैं।
बटखेम मंदिर में पूजा, चंबा में वीर सैनिक गब्बर सिंह नेगी को नमन
पदयात्रा के दौरान नई टिहरी और चंबा के बीच स्थित बटखेम मंदिर पहुंचकर उन्होंने पूजा-अर्चना की और माता का आशीर्वाद प्राप्त किया। इसके बाद चंबा की ओर बढ़ते हुए उन्होंने अपनी यात्रा को फिट इंडिया चैलेंज में दर्ज कराने का प्रयास भी किया।

चंबा पहुंचने पर उन्होंने प्रथम विश्वयुद्ध के वीर योद्धा और विक्टोरिया क्रॉस से सम्मानित राइफलमैन गब्बर सिंह नेगी के स्मारक पर पुष्प अर्पित कर श्रद्धांजलि दी। उन्होंने ग्राम मंज्यूड़ की ओर जाने वाले मार्ग के प्रवेश स्थल पर रुककर उस धरती को भी नमन किया, जिसने देश को एक वीर सैनिक दिया।
गब्बर सिंह नेगी ने प्रथम विश्वयुद्ध के दौरान अदम्य साहस का परिचय दिया था। 10 मार्च 1915 को फ्रांस के न्यूव शैपेल युद्ध में वीरगति प्राप्त करने वाले गब्बर सिंह नेगी को मरणोपरांत विक्टोरिया क्रॉस से सम्मानित किया गया था।
इस दौरान उन्होंने उत्तराखंड के महान जननायक अमर शहीद श्रीदेव सुमन का भी स्मरण किया। नागरिक अधिकारों, जनस्वतंत्रता और लोकतांत्रिक मूल्यों के लिए संघर्ष करने वाले श्रीदेव सुमन का बलिदान आज भी उत्तराखंड के इतिहास में विशेष स्थान रखता है। 25 जुलाई 1944 को उन्होंने अपने प्राणों का बलिदान दिया था।
चंबा बाजार में रोजगार की तलाश करते मजदूरों को देखा
सुबह करीब आठ से साढ़े आठ बजे के बीच चंबा बाजार से गुजरते हुए अपर जिलाधिकारी ने बड़ी संख्या में दिहाड़ी मजदूरों को काम मिलने की प्रतीक्षा करते देखा। ये श्रमिक सुबह से ही रोजगार की उम्मीद में बाजार में एकत्र थे। इस दृश्य ने पहाड़ में आजीविका और रोजगार से जुड़े जमीनी पहलुओं की झलक दिखाई।

बाजार के विभिन्न स्थानों पर गुटखा और पान मसाला खाकर थूकने के निशान तथा कुछ दुकानों के आसपास गंदगी भी दिखाई दी। इन दृश्यों ने सार्वजनिक स्वच्छता और स्वास्थ्य के प्रति जागरूकता बढ़ाने की आवश्यकता को रेखांकित किया।
उन्होंने अपनी पहचान उजागर किए बिना एक सामान्य यात्री की तरह यात्रा जारी रखी और रास्ते में दिखाई देने वाले सामाजिक जीवन के विभिन्न पहलुओं को करीब से समझा।
खेतों में दिखी पारंपरिक खेती, स्थानीय उद्यम और स्वरोजगार की तस्वीर
चंबा, नागणी, खाड़ी और आगराखाल क्षेत्र से गुजरते हुए उन्हें पहाड़ की कृषि और ग्रामीण अर्थव्यवस्था की विविध तस्वीर देखने को मिली। खेतों में टमाटर, बैंगन, मटर और बीन्स की खेती के साथ किसान धान की कटाई और मड़ाई में जुटे दिखाई दिए।
इस दौरान स्थानीय उद्यमी प्रवीण डंगवाल के लॉन्ड्री प्लांट को भी स्वरोजगार के उदाहरण के रूप में देखा। नागणी के निकट जड़धारगांव पहुंचने पर उन्होंने बीज बचाओ आंदोलन के प्रणेता विजय जड़धारी के प्रयासों का स्मरण किया। पारंपरिक बीजों और स्थानीय कृषि पद्धतियों का महत्व पहाड़ की खेती और खाद्य विविधता के संदर्भ में विशेष रूप से सामने आया।
यात्रा के दौरान राष्ट्रीय राजमार्ग-34 और ग्रामीण संपर्क मार्गों का भी अवलोकन किया गया। सड़क चौड़ीकरण से प्रभावित मकान, खेत और पुराने पैदल रास्ते दिखाई दिए। कई स्थानों पर भूस्खलन, पहाड़ी कटाव और सड़क किनारे मलबा भी नजर आया। वहीं, कुछ जगह सुरक्षात्मक दीवारें और तारों की जालियां बनी हुई थीं। इन दृश्यों ने सड़क संपर्क, विकास कार्यों और पर्यावरणीय संतुलन के बीच सामंजस्य की आवश्यकता को भी सामने रखा।
20 से अधिक प्राकृतिक जलस्रोत और झरनों ने खींचा ध्यान
पदयात्रा के दौरान चंबा, नागणी, खाड़ी और आगराखाल के बीच 20 से अधिक प्राकृतिक जलस्रोत और झरने दिखाई दिए। पहाड़ी ढलानों और चट्टानों से बहती जलधाराओं को देखकर उन्होंने इनके संरक्षण और स्वच्छता बनाए रखने के महत्व पर जोर दिया।
इस दौरान पहाड़ी पेडलर गजेंद्र रमोला और मैती आंदोलन के प्रणेता कल्याण सिंह रावत के साथ जलस्रोत संरक्षण से जुड़ी पूर्व यात्राओं का भी स्मरण किया। हेंवल नदी को देखते हुए उन्होंने भविष्य में इसके उद्गम से गंगा में संगम तक पैदल यात्रा करने की इच्छा जताई, ताकि नदी, उसके आसपास बसे गांवों और प्राकृतिक जलस्रोतों को करीब से समझा जा सके।
यह यात्रा प्राकृतिक संसाधनों के संरक्षण और आने वाली पीढ़ियों के लिए जलस्रोतों को सुरक्षित रखने की जरूरत का संदेश भी देती रही।
तिमली सेरा में संन्यासी से मुलाकात बनी प्रेरणादायक अनुभव
यात्रा के दौरान तिमली सेरा क्षेत्र में नाश्ते के लिए रुके शैलेंद्र सिंह नेगी की मुलाकात एक संन्यासी से हुई। संन्यासी गंगोत्री और यमुनोत्री की यात्रा पूरी कर लौट रहे थे। इससे पहले वे नर्मदा परिक्रमा, चारधाम और बारह ज्योतिर्लिंगों की यात्राएं भी पैदल कर चुके थे।
सीमित सामान के साथ लंबी यात्राएं करने वाले संन्यासी को उन्होंने नाश्ते के लिए आमंत्रित किया। बातचीत के दौरान जब उन्होंने अपने जन्मदिन पर 51 किलोमीटर की पदयात्रा के संकल्प के बारे में बताया तो संन्यासी ने उन्हें आशीर्वाद दिया। यह मुलाकात उनके लिए धैर्य, अनुशासन और सक्रिय जीवनशैली की प्रेरणा बन गई।
कबाड़ एकत्र करने वाले श्रमिक की मेहनत को सराहा
पदयात्रा के दौरान उनकी मुलाकात कबाड़ एकत्र करने का काम करने वाले एक व्यक्ति से भी हुई। बातचीत में उस व्यक्ति ने बताया कि वह पिछले कई दिनों से गांव-गांव घूमकर कबाड़ इकट्ठा कर रहा था।
उसकी मेहनत को देखकर अपर जिलाधिकारी ने महसूस किया कि पर्यावरण संरक्षण में ऐसे श्रमिकों का योगदान महत्वपूर्ण है। अनुपयोगी सामग्री को एकत्र कर उचित निस्तारण के लिए भेजने से वह खेतों, खाली जमीनों और अन्य स्थानों पर बिखरने से बच सकती है। इससे भूमि प्रदूषण और प्राकृतिक जलस्रोतों पर पड़ने वाले संभावित प्रतिकूल प्रभावों को कम करने में मदद मिलती है।
उन्होंने इस कार्य के लिए उस व्यक्ति के प्रति आभार व्यक्त किया और स्वच्छ पर्यावरण बनाए रखने में ऐसे श्रमिकों की भूमिका को महत्वपूर्ण बताया।
खाड़ी में राज्य आंदोलन के शहीद को दी श्रद्धांजलि
यात्रा के दौरान खाड़ी पहुंचकर उन्होंने उत्तराखंड राज्य आंदोलन के शहीद रवीन्द्र सिंह रावत के स्मारक पर पुष्प अर्पित कर श्रद्धांजलि दी। इसके साथ ही पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के स्मारक पर भी पुष्प अर्पित कर उन्हें याद किया।
आगे बढ़ने पर वन गुर्जर परिवार अपने पशुओं के साथ निचले इलाकों की ओर जाते दिखाई दिए। खाड़ी और बेमुंडा के बीच एक बुजुर्ग नेपाली व्यक्ति खेतों के लिए जैविक खाद तैयार करने के उद्देश्य से पशुओं का गोबर एकत्र करते मिले। उनकी मेहनत और स्थानीय संसाधनों के उपयोग ने पारंपरिक खेती तथा ग्रामीण जीवन की उपयोगिता को उजागर किया।
जन्मदिन की पदयात्रा ने दिया फिटनेस, विरासत और पर्यावरण संरक्षण का संदेश
नई टिहरी से मां कुंजापुरी मंदिर तक लगभग 51 किलोमीटर की पदयात्रा अपर जिलाधिकारी शैलेंद्र सिंह नेगी के लिए जन्मदिन मनाने का अनूठा तरीका ही नहीं, बल्कि पहाड़ को करीब से समझने का अवसर भी बनी। इस दौरान उन्होंने वीर सैनिकों और शहीदों को नमन किया, किसानों और श्रमिकों से संवाद किया, स्थानीय उद्यमों और पारंपरिक खेती को देखा तथा प्राकृतिक जलस्रोतों के संरक्षण की आवश्यकता को महसूस किया।
जीवन के 51वें वर्ष में प्रवेश के अवसर पर शुरू हुई यह यात्रा बताती है कि व्यक्तिगत संकल्प को सामाजिक जागरूकता से जोड़कर भी यादगार बनाया जा सकता है। नियमित शारीरिक गतिविधियों, पहाड़ की सांस्कृतिक विरासत के सम्मान, ग्रामीण आजीविका और प्राकृतिक संसाधनों के संरक्षण का संदेश इस पदयात्रा के प्रमुख पहलू रहे।