उत्तराखंड हाईकोर्ट की हल्द्वानी शिफ्टिंग पर फिर लगा ब्रेक, 30 हेक्टेयर वन भूमि का प्रस्ताव खारिज।

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बेलबाबा-लामाचौड़ में हाईकोर्ट परिसर बनाने की योजना को केंद्रीय समिति की मंजूरी नहीं; गैर-वन भूमि के विकल्पों की पर्याप्त तलाश न होने पर उठाए सवाल, अब वैकल्पिक जमीन तलाशने की चुनौती

हल्द्वानी/नैनीताल। उत्तराखंड हाईकोर्ट को नैनीताल से हल्द्वानी स्थानांतरित करने की योजना को बड़ा झटका लगा है। केंद्रीय पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय की क्षेत्रीय अधिकार प्राप्त समिति (Regional Empowered Committee—REC) ने हल्द्वानी के बेलबाबा-लामाचौड़ क्षेत्र में प्रस्तावित हाईकोर्ट परिसर के लिए 30 हेक्टेयर आरक्षित वन भूमि के डायवर्जन संबंधी प्रस्ताव को खारिज कर दिया है। 16 अक्टूबर 2026 को देहरादून में हुई समिति की बैठक में इस प्रस्ताव पर विचार किया गया था। 27 और 28 अक्टूबर को प्रकाशित मीडिया रिपोर्टों के अनुसार, समिति ने मुख्य रूप से इस बात पर आपत्ति जताई कि परियोजना के लिए उपयुक्त गैर-वन भूमि के विकल्पों की पर्याप्त तलाश नहीं की गई।

इस फैसले से हाईकोर्ट की शिफ्टिंग के लिए प्रस्तावित मौजूदा स्थल पर आगे बढ़ने में बाधा आई है। हालांकि, इसे शिफ्टिंग की पूरी योजना का स्थायी अंत मानना सही नहीं होगा। अब आगे की प्रक्रिया राज्य सरकार और संबंधित एजेंसियों द्वारा वैकल्पिक भूमि तलाशने तथा आवश्यक वैधानिक मंजूरियां प्राप्त करने पर निर्भर करेगी।

बेलबाबा के निकट वन भूमि पर प्रस्तावित था नया परिसर

हाईकोर्ट के नए परिसर के लिए हल्द्वानी के लामाचौड़ ब्लॉक में भाखड़ा रेंज के अंतर्गत तराई पूर्वी वन प्रभाग के वन क्षेत्र में जमीन चिह्नित की गई थी। यह स्थान बेलबाबा मंदिर के निकट हल्द्वानी-रुद्रपुर मार्ग के आसपास है।

राज्य सरकार ने 12 अगस्त 2026 को इस स्थल पर 30 हेक्टेयर भूमि के उपयोग के लिए प्रशासनिक मंजूरी दी थी। प्रस्तावित परिसर में आधुनिक न्यायिक भवन, पार्किंग, खुले स्थान और अन्य संस्थागत सुविधाएं विकसित करने की योजना थी। लेकिन प्रशासनिक मंजूरी मिलने के बावजूद आरक्षित वन भूमि को गैर-वानिकी उपयोग में लाने के लिए आवश्यक केंद्रीय वन स्वीकृति का सवाल बना हुआ था।

केंद्रीय समिति ने इसी प्रस्ताव की समीक्षा के बाद इसे मंजूरी देने से इनकार कर दिया।

समिति की मुख्य आपत्ति क्या थी?

मीडिया रिपोर्टों के मुताबिक, समिति ने पाया कि हाईकोर्ट परिसर जैसी संस्था के निर्माण के लिए गैर-वन भूमि के विकल्पों की पर्याप्त और विधिवत तलाश किए जाने का स्पष्ट आधार प्रस्ताव में नहीं था।

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प्रस्ताव में गैर-वन भूमि उपलब्ध नहीं होने का प्रमाणपत्र दिए जाने की जानकारी सामने आई, लेकिन समिति के अनुसार यह पर्याप्त रूप से प्रदर्शित नहीं किया गया कि अन्य संभावित गैर-वन स्थलों की उपयुक्तता का समुचित परीक्षण किया गया था या नहीं।

समिति की चर्चा में यह तर्क भी सामने आया कि जब संबंधित क्षेत्र में क्षतिपूरक वनीकरण के लिए गैर-वन भूमि चिह्नित की जा सकती है, तो हाईकोर्ट परिसर के लिए भी ऐसे विकल्पों की तलाश की जानी चाहिए।

इसी आधार पर राज्य सरकार और परियोजना से जुड़ी एजेंसी के सामने पहले उपयुक्त गैर-वन भूमि तलाशने की आवश्यकता रखी गई।

123 पेड़ों की कटाई और करोड़ों रुपये का प्रस्ताव

प्रस्तावित 30 हेक्टेयर वन भूमि के उपयोग से पर्यावरण पर पड़ने वाले प्रभाव का प्रश्न भी महत्वपूर्ण था। मीडिया रिपोर्टों के अनुसार, परियोजना के लिए कुल 123 पेड़ों की कटाई प्रस्तावित थी। इनमें 75 सागौन और तीन पीपल के पेड़ों के अलावा यूकेलिप्टस, सेमल, हल्दू और खैर जैसी प्रजातियों के पेड़ शामिल थे।

प्रस्ताव के वित्तीय विवरण के अनुसार:

  • वन भूमि की नेट प्रेजेंट वैल्यू (NPV): ₹3,68,57,700 यानी लगभग 3.69 करोड़ रुपये।
  • क्षतिपूरक वनीकरण के लिए प्रस्तावित क्षेत्र: 60 हेक्टेयर गैर-वन भूमि।
  • क्षतिपूरक वनीकरण की अनुमानित लागत: ₹3,46,45,883 यानी लगभग 3.46 करोड़ रुपये।

क्षतिपूरक वनीकरण का उद्देश्य वन भूमि के उपयोग से होने वाली पर्यावरणीय क्षति की भरपाई के लिए निर्धारित क्षेत्र में पौधरोपण करना है। हालांकि, इस तरह की व्यवस्था होने मात्र से आरक्षित वन भूमि के उपयोग की मंजूरी स्वतः नहीं मिल जाती। इसके लिए संबंधित वन कानूनों और निर्धारित प्रक्रियाओं का पालन जरूरी है।

गौलापार का प्रस्ताव भी पहले हो चुका है खारिज

हाईकोर्ट को हल्द्वानी स्थानांतरित करने के लिए यह पहला वन भूमि संबंधी प्रस्ताव नहीं था, जिसे मंजूरी नहीं मिली।

इससे पहले गौलापार क्षेत्र में 26.08 हेक्टेयर वन भूमि पर हाईकोर्ट परिसर बनाने का प्रस्ताव रखा गया था। 24 जनवरी 2024 को देहरादून में हुई क्षेत्रीय अधिकार प्राप्त समिति की बैठक में इसे भी खारिज कर दिया गया था। उस प्रस्ताव में 4,238 पेड़ों की कटाई का विषय सामने आया था और परियोजना के लिए उपयुक्त गैर-वन भूमि के विकल्पों को लेकर आपत्तियां उठी थीं।

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इसके बाद परियोजना के लिए दूसरे स्थल के रूप में लामाचौड़-बेलबाबा क्षेत्र का चयन किया गया। लेकिन यहां भी वन भूमि के डायवर्जन की मंजूरी नहीं मिलने से शिफ्टिंग की योजना के सामने एक नई बाधा आ गई है।

नैनीताल से हाईकोर्ट शिफ्ट करने के पीछे क्या हैं तर्क?

हाईकोर्ट को हल्द्वानी स्थानांतरित करने के पक्ष में प्रमुख तर्क नैनीताल में सीमित स्थान, बढ़ती न्यायिक आवश्यकताओं, यातायात दबाव और पर्यटक सीजन के दौरान होने वाली परेशानियों से जुड़े रहे हैं।

नैनीताल एक प्रमुख पर्यटन स्थल है। पर्यटन सीजन में शहर में जाम और पार्किंग की समस्या बढ़ जाती है। अदालतों में आने वाले वादकारियों, अधिवक्ताओं और अन्य लोगों को भी आवागमन तथा ठहरने से जुड़ी कठिनाइयों का सामना करना पड़ सकता है।

इसके अलावा, उपलब्ध स्थान में न्यायिक आधारभूत ढांचे के विस्तार की सीमाओं और लंबित मुकदमों की बढ़ती संख्या को भी शिफ्टिंग के पक्ष में प्रस्तुत किया गया है। मीडिया रिपोर्टों में दिए गए आंकड़ों के अनुसार, हाईकोर्ट में लंबित मामलों की संख्या 2010 में लगभग 4,000 से बढ़कर अब करीब 64,000 बताई गई है।

हल्द्वानी में नया परिसर बनने से कुमाऊं और गढ़वाल के विभिन्न क्षेत्रों से आने वाले लोगों की पहुंच बेहतर होने की उम्मीद जताई गई थी। हालांकि, परियोजना को आगे बढ़ाने के लिए भूमि संबंधी कानूनी और पर्यावरणीय शर्तों का पूरा होना अनिवार्य है।

सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बावजूद वन मंजूरी क्यों जरूरी?

हाईकोर्ट की शिफ्टिंग का मामला न्यायिक प्रशासन और भूमि हस्तांतरण से जुड़े स्तर पर भी आगे बढ़ा है। मीडिया रिपोर्टों के अनुसार, 15 जुलाई 2026 को सुप्रीम कोर्ट ने हाईकोर्ट बार एसोसिएशन बनाम उत्तराखंड राज्य मामले में अपील स्वीकार करते हुए पहले दिए गए उस निर्देश को निरस्त किया था, जिसमें शिफ्टिंग के संबंध में जन परामर्श की व्यवस्था पर विचार किया गया था। सुप्रीम कोर्ट ने संबंधित अधिकारियों को चिह्नित भूमि का कब्जा हाईकोर्ट को मौजूदा स्थिति में सौंपने के निर्देश भी दिए थे।

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लेकिन भूमि का प्रशासनिक आवंटन या कब्जा सौंपना और आरक्षित वन भूमि को गैर-वानिकी उपयोग में लाने की वैधानिक अनुमति अलग-अलग विषय हैं। वन संरक्षण संबंधी आवश्यक मंजूरी के बिना केवल प्रशासनिक निर्णय के आधार पर वन भूमि पर निर्माण शुरू नहीं किया जा सकता।

इसी कारण शिफ्टिंग के पक्ष में अन्य निर्णय होने के बावजूद प्रस्तावित स्थल के लिए वन स्वीकृति एक महत्वपूर्ण शर्त बनी हुई है।

प्रशासन को औपचारिक सूचना मिलने का भी इंतजार

इस मामले में एक महत्वपूर्ण तथ्य यह भी है कि 28 अक्टूबर 2026 को प्रकाशित अमर उजाला की रिपोर्ट में कुमाऊं मंडलायुक्त दीपक रावत और नैनीताल के जिलाधिकारी ललित मोहन रयाल के हवाले से बताया गया कि रोक संबंधी औपचारिक सूचना प्रशासन को अभी प्राप्त नहीं हुई थी। इसलिए केंद्रीय समिति के निर्णय और स्थानीय प्रशासन को उसकी आधिकारिक सूचना मिलने की स्थिति को अलग-अलग समझना जरूरी है।

समिति के निर्णय की रिपोर्टिंग सामने आने के बावजूद आगे की प्रशासनिक कार्रवाई के लिए संबंधित आदेश और आधिकारिक पत्राचार महत्वपूर्ण होंगे।

अब आगे क्या होगा?

वर्तमान स्थिति में राज्य सरकार के सामने सबसे बड़ी चुनौती हाईकोर्ट परिसर के लिए उपयुक्त गैर-वन भूमि तलाशना है। इसके लिए संभावित स्थलों की पहचान, भूमि की उपलब्धता और कानूनी स्थिति की जांच, पहुंच मार्गों तथा आधारभूत सुविधाओं का आकलन और संबंधित विभागों के बीच समन्वय आवश्यक होगा।

यदि कोई उपयुक्त वैकल्पिक स्थल मिलता है, तो उस पर परियोजना को आगे बढ़ाने के लिए जरूरी प्रशासनिक और अन्य वैधानिक प्रक्रियाएं पूरी करनी होंगी। फिलहाल, किसी नए स्थल को अंतिम रूप दिए जाने की पुष्टि नहीं है।

निष्कर्ष: उत्तराखंड हाईकोर्ट को नैनीताल से हल्द्वानी स्थानांतरित करने की योजना के सामने बेलबाबा-लामाचौड़ की 30 हेक्टेयर आरक्षित वन भूमि का प्रस्ताव खारिज होना एक बड़ी बाधा है। केंद्रीय समिति की प्रमुख आपत्ति गैर-वन भूमि के विकल्पों की पर्याप्त तलाश नहीं किए जाने को लेकर है। अब परियोजना की अगली दिशा इस बात पर निर्भर करेगी कि राज्य सरकार वैकल्पिक भूमि तलाशकर कानूनी और पर्यावरणीय मानकों के अनुरूप आगे की प्रक्रिया कैसे पूरी करती है।

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